सप्त कविता संग्रह
… *कविता संग्रह*
अनिरुद्ध पाण्डेय
कविता
1. प्रेम मिल गया तो जिन्दगी मुकम्मल हो गई।
जैसे ये रेशमी कुर्ता, हाय मखमल हो गई ।
प्रेम ने जिंदगी को कराया रस आभान।
जिंदगी प्रेम करके मुकम्मल हो गई।।
2. तकदीर लिखने वाले एक बार फिर से बचपन का दौर लिख दे
चिंतामयी जवानी से, चिंतामुक्त बचपन का पहर लिख दे
आया हूं मां के आंचल से दूर नए शहर में,
तकदीर लिखने वाले एक बार फिर से मां का आंचल और पिता का घर लिख दे।।
3. चौसर के पासों पर निर्वस्त्र केवल द्रौपदी ही नहीं,
अपितु पूरे भारत वर्ष की मर्यादा हुई थी।।
4. उस खारे सागर ने जन्मा मुकुताफल ,
फिर भी नदियों ने कहा खारा है समुंद्र का जल
5.
आँगन झूम उठी ,
माँ माथ चूम उठी ,
घर खिल उठी,
नवीन आँख मेरे, घर को मुस्कुराते देखते रहे ।
जिंदगी गुजर गई, गीत लिखते रहें
चेतना जब तलक उठी की, हाय उम्र ढल गई ,
तितलीयाँ बाग छोड़ चली थी, की हाय फुल मिल गई,
फिर गली गली महक गए जब कली कली खिल गई ,
पक्षी घर चल दिए, धुप दल गई और हम लफ्ज़ - लफ़्ज लिखते गए छंद छंद बनते गए
गीत लिख रहे की चाँद-तारे नुमाईशी शैन करते गए
फिर भी हम अपनी गीत में खोए - खोए रहे
ग्रुप आई शबनम रंग लाई, अरशा हो गया चाँद को गए
गए
रात की चाह में दिन को ढलते देखते रहे
जिंदगी गुजर गई गीत-लिखते रहे
इश्क का सबाब ऐसा की हर मौसम निहार दूं,
हाथ से में उसकी जुल्फें सवार हूँ
इश्क़ से चाँद तारों की खूबसूरती फीका करारा दूं
यादों में रात सवार दूं नीद नकार दूं
आकाश की ओर देख-देखकर मुस्कुरा रहे हैं
राह भूले चाँद को जुगनु राह दिखा रहे ,
इस नादानी को खड़े खड़े
चलती सफर मे रुके रुके देख कर कहा-
"प्रकृति भी इश्क करना सिखा रहे है
घर से फिर लड़े लड़े
बिस्तर पर पड़े पड़े
तकियों को आसूयों से भिंगौते गए
अधरों पर नर्म स्वर से छंद उतारते रहें
जिन्दगी गुजर गई, गीत लिखते रहे।।
आँख थे मिले की, आँख से नज़रे उतार दूं
ठान लिए तो बन मांझी, पहाड को तार-तार कर दूं
तुम्हारी तबस्सुम पर पुरी की पुरी तिलस्मी दुनिया न्यौछावर कर दूं
अंतरात्मा कहती कह दे इजहार तू, न कर सका फरवरी को क्या उतर दूं
हमें इश्क ना मिला वक्त से क्या गिला
वेदना कहने को कोई कंधा ना मिला
तो, कागज़ कलम में खुद को रख के, खुद को पा लिया
मैं जा रहा हूं सुन कलम रो रही
रो पड़ी फिर गली गली
कह पडी कली कली
की इश्क अनिरुद्ध के अधरों पर है पली पली,
ओढ़ कर कफन चला, कर मौन अश्क को
मिलकर लोग कर रहे पूर्ण, बरसों के अपूर्ण इश्क को
जाने वाला चला लोगों के अघर कहे, और करे एक दूजे के मॉन अश्क को
और हम काफिले के उपर से से, मजार देखते रहें
जिन्दगी गुज़र गई गीत लिखते रहें
उससे बात किए बिना कैसे बीत आठों प्रहर जाए
उसको रंग लगाए बिना कैसे फाग की बहार जाए
उसको रूठा देख उसके पास तितलियों दो पल ठहर जाए उसको मानने जुगनु भी उसके शहर जाए
नभ में यूं अंधकार छाया रहे न जल्दी शहर आए
आते देख सहर को,
छिप रही समर क्यों
क्यों भय तुमको लाने देती जुगनु को उसकी खबर न
आई कोई खबर, फिर, बही अश्रु की। धारा
और हम लूटे लूटे
, वक्त के पीठे पीठे
की अश्क इश्क की होरी है ये कहते रहे
जिन्दगी गुजर गई गीत लिखते रहें
6 . इस दुनियां में हर चीज़ हस्बमामुल नहीं है
कुछ चीजों को महसूस कर के पा लेना चाहिए, जैसे की प्रेम
7 . एकांत, सुकुन का उत्तम साथी है
*धन्यवाद*
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