तुलना छोड़े, तुलना त्यागें,विवेक का इस्तेमाल करें।

इंसान के परेशान ,व्यथित, असंतुष्ट रहने का एक और सबसे बड़ा कारण है बेबुनियादी तुलना।
यहां पे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की बात करें तो वो अलग बात है ,लेकिन हम उस तुलना की बात करते हैं जो हमे पंगु बनाता है , ईर्ष्या से ,हिंसा से भर देता है |

आइए देखते हैं तुलना का जन्म क्यों बेबुनियाद है,
आप जब अकेले हो तो मानिए कि इस दुनिया में आप अकेले है ,सिर्फ आप हैं आप के अलावा कोई नहीं, तीसरा विश्वयुद्ध हो गया है, सिर्फ मानने को ऐसा ।।

फिर आप देखेंगे कि आप तुलना कर ही नहीं सकते ,क्यों क्योंकि तुलना हमेशा विपरीत चीजों पर निर्भर होती है।

अगर आप दुनिया में अकेले हो तो सोचो आप कैसे बोल सकोगे कि आप गोरे हो या काले हो,
लंबे हो या ठिगने हो।
कुरूप हो या सुंदर हो।
मूढ़ हो या बुद्धिमान हो।
अमीर हो या गरीब हो।
आप पाओगे कि सिर्फ दुनिया में आप  ही हो  आपकी एक स्वतंत्र हस्ती है, उस समय आपको असीम शांति का एहसास होगा, और वो चीज आप इस वक्त भी महसूस कर सकते हैं, क्योंकि आप जैसा कुदरत ने दूसरा इस संसार में नहीं बनाया है, 
लेकिन ये संसार है आपको रहना है , लोगों से व्यवहार भी करना है तो आप  खुद से अनुस्पर्धा कीजिए।
हमेशा कल से बेहतर करने का प्रयास कीजिए,
हमेशा एक बड़े लक्ष्य को लेके उसमें अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा, क्षमता, पौरुष लगाइए।
और हर पिछले दिन से बेहतर का प्रयास कीजिए,
अपने से की गई अनुस्पर्धा आपको खुशी का एहसास भी कराएगी ,आपका सर्वांगीण विकास भी करेगी।
जीवन को इतनी गंभीरता से लेना नहीं है क्योंकि ये बहुत लंबी नहीं है नष्ट हो जानी है , इसीलिए उत्साह ,आनंद के प्रयास के साथ  ऊंचे लक्ष्य के साथ जीने  का प्रयास करें।

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