डर को कैसे जीतें,काबू पाएं!!

डर का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता,जैसे अंधकार का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता ,ठीक वैसे ही।।
अंधकार क्या है - प्रकाश की गैरमौजूदगी ।
जब प्रकाश नहीं होगा तब अंधकार होगा।

मतलब प्रकाश सर्वत्र है यह स्वतंत्र अस्तित्व है, 
सूर्य हमेशा प्रकाशित रहते हैं लेकिन जब कोई स्थान छिपता है तो वहां अंधकार दिखता है।
यानि प्रकाश की गैरमौजूदगी ही अंधकार है।

इसी तरह डर सिर्फ कल्पना है ,इसका मुख्य वजह अज्ञान है ,जब किसी घटना , वस्तु का बोध हो तो इंसान में विवेक ,समझदारी होती है, उस समय डर नहीं होता।
उदाहरण के लिए यदि रात के समय कोई मोटी रस्सी हुबहू सांप की तरह दिखे तो लोग भयभीत हो जाते हैं,लेकिन समझदार इंसान शीघ्र ही पता कर लेता है कि जिसको कल्पना करके वह डर रहा है वह एकमात्र भ्रम है ,रस्सी है । भ्रम टूटा दर खत्म, कल्पना से वास्तविकता में आए डर खत्म ।
हमारे ज्यादातर डर काल्पनिक होते हैं।
लेकिन प्राचीन काल से जब इंसान जंगल से लेकर शहर,गांव तक जीवन विकास  की यात्रा किया है तब से इंसानों का डर ने बहुत साथ दिया है ,यही डर इंसानों की अस्तित्व को आज तक बचाए रखने में सहयोगी भी रही है।

कुछ हद तक डर हमारे लिए हितकारक,लाभकारी रहे हैं,लेकिन हर समय बेवजह डरना हमारे विकास को अवरूद्ध करता है एवं बेचैनी देता है।
हमारी प्रसन्नता छीन लेता है।
आप इतिहास में देखेंगे कि जो भी महापुरुष शांत ,प्रसन्न रहे हैं उनमें डर नहीं रहा है।
एक उदाहरण देखते हैं जैसे महात्मा बुद्ध। उन्हें किसी हिंसक पशु से डर नहीं था, सर्वत्र स्नेह और प्रेम लुटाते थे,इसीलिए जंगलों में भी सहज भाव से विचरण करते थें,किसी भी गांव में चले जाते थें।
एक बार एक राजा एक बकरे की बलि देने जा रहा था, महात्मा बुद्ध ने राजा से बोला जब इस निरीह जानवर की बलि से आपको महान फल मिल सकता है तो आप इसके स्थान पर मेरा बलि दे दीजिए , जिससे आपको और भी महान फल प्राप्त हो।
राजा ने प्रभावित होकर बकरे को रिहा कर दिया।
बकरे के प्रति महान करुणा रखने वाले ऐसे थे करुणा के ईश्वर महात्मा बुद्ध ।
उनको रत्ती भर डर नहीं था उनकी बलि का, अस्तित्व खत्म होने का , यही होता है बोध से करुणा से।

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